Tuesday, November 22, 2011

रजत जयंती


  आ नयनों में नीर हो गए, मन के मेरे भाव सभी l
श्री कृष्ण कृपा या श्री कृष्ण कहूँ मैं, जीवन के मेरे ये अर्थ सभी ll

जीवन है बस संग रहने में, संग-संग हंसने- रोने में l
बचपन के पल अनमोल हैं सारे, सपनों में, जगने-सोने में ll
इक ममता, इक उपवन, इक पौधे के फूल सभी l
श्री कृष्ण कृपा या श्री कृष्ण कहूँ मैं, जीवन के मेरे ये अर्थ सभी ll

अंगुली पकडे चलता था बचपन, संग मैया बहिन के रहता था l
क्यों बन गयी गहना दूजे के घर का, मैया से अपनी कहता था ll
नीर बहता अब भी पल-पल, याद जब आते पल वो सभी l
श्री कृष्ण कृपा या श्री कृष्ण कहूँ मैं, जीवन के मेरे ये अर्थ सभी ll

संस्कार पिरोती, मान संजोती, दो कुल का अभिमान भई l
साथी मिला जीवन का ऐसा, हर ख्वाईश मन की पूरी हुई ll
बचपन भी बड़ा हो गया, रिश्ते निभाए हंस-हंस सभी l
श्री कृष्ण कृपा या श्री कृष्ण कहूँ मैं, जीवन के मेरे ये अर्थ सभी ll

नए आँगन में, नए रिश्तों ने, सबने यूँ अपनाया l
भूली अंगना अपने बाबा का, यूँ मान -प्रेम सब पाया ll
निभाती इनको, अनमोल जो रिश्ते, निभाती मैया के सबक सभी l
श्री कृष्ण कृपा या श्री कृष्ण कहूँ मैं, जीवन के मेरे ये अर्थ सभी ll

गगन-धरा जब एक हुई, दो अंकुर फूटे नयी बगिया में l
खेल-खिलौने ये बन गए दोनों, उनके सपने बस अखियों में ll
समय दौड़ता आगे-पीछे, सदृश्य हो गए पल वो सभी l
श्री कृष्ण कृपा या श्री कृष्ण कहूँ मैं, जीवन के मेरे ये अर्थ सभी ll

इक राखी और हैं तीन कलाई, माँ-बाबा की लाडो के तीन हैं भाई l
तुझ बिन इनका अधूरा जीवन, बिन तेरे अपनों के कोई भलाई ll
तुम दोनों से सब आशा-निराशा, चलते जीवन के श्वास सभी l
श्री कृष्ण कृपा या श्री कृष्ण कहूँ मैं, जीवन के मेरे ये अर्थ सभी ll

सखी है बहना तू मैया की, है तू बाबा का साहस और प्यार l
हम फैले चाहे धरती-गगन पर, तेरा रहेगा पूरा अधिकार ll
तुम सब हमको जान से प्यारे, प्यारे प्यारऔर तिरस्कार सभी l
श्री कृष्ण कृपा या श्री कृष्ण कहूँ मैं, जीवन के मेरे ये अर्थ सभी ll

वक़्त भी बदला हालत भी बदले, सदा रहे एक से सब आयाम नहीं 
हर कसौटी जीवन की पार करी तुम, चाहे पाए कोई नाम हैं नहीं
आज बधाई दे जग तुमको, तुम्हें पाते अपने जीवन में सभी 
श्री कृष्ण कृपा या श्री कृष्ण कहूँ मैं, जीवन के मेरे ये अर्थ सभी ll

बचपन खोजे, वक़्त संजोए, मन के भाव अधीर हुए 
जीवन बिता सब धुप-छाँव में,तुम रंगों-खुशबू के उपवन हुए 
रजत मनाते इस पावन रिश्ते की,गदगद हुए मन आज सभी 
श्री कृष्ण कृपा या श्री कृष्ण कहूँ मैं, जीवन के मेरे ये अर्थ सभी ll



 'हृदय' बलैयां ले पल-पल मैया,भरे दामन जीवन की ख़ुशी सभी l
तुम दोनों, दोनों रहो संग-संग, जीवन में फबते तब रंग सभी ll
इस रिश्ते का मनाएं शतक हम आधा, देखें सपना हम भाई सभी l
श्री कृष्ण कृपा या श्री कृष्ण कहूँ मैं, जीवन के मेरे ये अर्थ सभी ll

Thursday, November 10, 2011

मैं बचपन हूँ...

मैं बचपन हूँ...
     मैं बचपन हूँ...
         मैं बचपन हूँ...
यह भाव बड़ा ही निराला है 

परिभाषा यह हर भाषा की,
जीवन में, जीवन को, जीवन से भरने वाला है 

ऊँचा है हर ऊँचाई से, 
गहराई में, गहराई को, गहराई से भरने वाला है

जीवन्त करता हर पल को यह, 
सरलता में, सरलता को, सरलता से भरने वाला है

सबसे बड़ा यह अधिकारों में, 
मोहब्बत  में, मोहब्बत को, मोहब्बत से निभाने वाला है

दृश्य यह मन का उपवन करता, 
यादों में, यादों को, यादों से भरने वाला है

"हृदय" का यह प्रणाम प्रभु को, 
खुद में, खुद को, खुद से मिलाने वाला है

Thursday, November 3, 2011

क्या आप मेरी मदद करेंगे ?

हैलो ! आप कैसे हैं ? 

मैंने इधर उधर देखा और फिर चलने लगा l  

मुझे फिर से आवाज़ आई, "मैं आप ही से बात कर रहा हूँ l"

मुझे लगा कि कोई सफ़ेद दाढ़ी , झुकी हुई कमर और जर्जर शारीर वाला वृद्ध मुझे पुकार रहा है l

मैंने उनसे पूछा, "क्या मैं आपको जनता हूँ?"

उन्होंने उत्तर दिया, "जी हैं पर आप शायद मुझे भूल गए है l मैं तो सभी को जानता हूँ l सब मुझे आपके इस समाज कि नींव मानते है l इस समाज का भविष्य मानते हैं पर मैं भविष्य से ज्यादा वर्तमान हूँ, समाज की कसौटी हूँ l मैं खुद में पूर्ण समाज हूँ

आज मै जैसा दिखता हूँ, सदैव ऐसा नहीं था वरन मेरा स्वरुप, व्यवहार और भूमिका बड़े-बड़े खानदानों और उनके संस्कारों की पहचान थी l मुझे सभी का स्नेह, आदर और देख-रेख मिलती थी l किसी युग में स्वयं दशरथ जैसे राजा मेरे पीछे दौड़ते थे, तो इस युग में जीजाबाई जैसी माँ ने मुझे पाला-परोसा l श्री कृष्ण रूप में नन्द गाँव की तो मैं जीवन-श्वास था l वह तो मेरा क्रीड़ास्थल था

मैं बच्चपन हूँ

वही बच्चपन जो निर्मलता और सत्यता का पर्याय था l वह था मिट्टी का ढेर जिस पर कुम्हार सारी उम्र मेहनत करता था l मेहनत तो आज भी करता है परन्तु उसका तरीका बदल गया है l पहले वह भावपूर्ण हृदय का कलाकार था l वह हृदय से कोमल एवं डंडे की सख्ती भरे मज़बूत हाथ लिए अपने फन का माहिर था और यही उसका स्वरुप भी था l उसकी दूरदर्शिता और दिया हुआ स्वरुप मुझे हमेशा गौरवान्वित करता था l वह सुविचारों और संस्कारों से सदैव मुझे संवारता रहता था

मगर आज का कुम्हार तो कहीं असंमंजस में फंसा रहता है l उसे मेरा स्वरुप समझ ही नहीं आ रहा है l वह मुझे राह नहीं दिखा पा रहा है l आज उसी कि दुविधा का परिणाम मैं भोग रहा हूँ

मै खेल नहीं पता हूँ l केवल किताबों में घुट कर रह गया हूँ मैं बूढ़ा नज़र आने लगा हूँ l मेरी स्फूर्ति ख़त्म हो रही है l मुझे टी.वी. हो गया है l मैं अत्यधिक कम्प्यूटर के रोग से ग्रस्त हूँ l मुझे दमा भी होने लगा है क्योंकि स्वच्छ एवं निर्मल सांस तो मिलनी बंद होती जा रही है l सारे वातावरण में आडम्बर, दिखावे और अंधी प्रतिस्प्रधा का कैंसर हुआ है और मुझे रिश्तों और विश्वास की दवा भी नहीं मिल रही है

परन्तु इस बदलते हुए माहौल ने मुझे किफायती बना दिया है l पहले मैं बहुत नटखट था l शैतानियाँ तो मेरी परिभाषा थी l अब मैं समझदार हो गया हूँ l मुझे पैसे की समझ हो गयी है l मतलबपरस्ती, अपना पराया इत्यादि मेरे शबदकोश की शान बनने लगे है l इनसे मेरा केवल परिचय ही नहीं हुआ बल्कि अब तो मेरा अन्तरंग सम्बन्ध होने लगा है l अब मैं कोरा सामाजिक हो गया हूँ l  

पर मैं तो मैं रहा ही नहीं ना

मैं कोट-पैंट मैं बहुत फ़ब्ता हूँ l अब मुझे टाई बांधनी भी आती है l मेरे ब्वाय और गर्ल फ्रैंड भी हैं अब मुझे नशे का स्वाद भी पता है l मुझे बाज़ार की चींजे बहुत अच्छी लगती हैं l मैं अपने साथियों के साथ जन्मदिन रेस्टोरेंट में मनाता हूँ और मुझे बिल व टिप देने मैं बड़ा मज़ा आता है

लेकिन मैं खुद को कतई भी ढूंढ़ नहीं पा रहा हूँ l मैं खुद ही पहचान नहीं पा रहा हूँ l  कभी-कभार गिल्ली-डंडे, कंचे, छुप्पन-छुपाई जैसे खेलों को तरस जाता हूँ l मेरे त्यौहार बदल गए हैं l मेरे खेल और उनके तरीके बदल गए हैं l मेरे स्वाद अब पहले जैसे रहे ही नहीं l मैं स्वस्थ दिख कर भी बीमार रहने लगा हूँ l  

मैं आपको अपनी स्थिति से इसलिए अवगत कराने आया हूँ क्योंकि आपने मुझे पहले देखा हैं l आप मेरी सही पहचान जानते हैं l आपकी यादों में आज भी मेरा अनुपम स्थान हैं l मैं फिर से स्वस्थ जीवन चाहता हूँ 

निराश-हताश सा मैं जंगल में भी गया था, वहां मेरे भाई जानवरों में अभी भी अपना पुराना स्वरुप कायम रखे हुए हैं l भगवान् द्वारा मनुष्य जन्म जो मुझे वरदान सा लगा था, वह इतनी जल्दी अभिशाप बन जायेगा मुझे ऐसी आशा नहीं थी l मैं आपसे अपने जीवन की रक्षा के लिए मदद मांगने आया हूँ

क्या आप मेरी मदद करेंगे ?  


Saturday, October 8, 2011

I got my birth when you are alive

When I count the pride of my life
I got my birth when you are alive

The sun rays which saw your shine
Made my day bright and fine
The air which embraces you
Provide breath to mine
Your twinkling eyes, your sixth sense on five
I got my birth when you are alive

Many are wise, many have riches
Handsome and smart, blessed with wishes
In the ocean of you
They all are fishes
You are abundance of love, Humanity’s hive
I got my birth when you are alive

The day of your birth
The honour of earth
I wish you dreams
With love and echoing screams
Blessing happy living, Be always live
I got my birth when you are alive

Friday, October 7, 2011

Self Imaging



Self Image plays a vital role in success of people. Self image directly controls the result area of a person. Every behaviour and outcome can be changed of a person by just changing his own way to see himself.

You are unique and especially gifted by God to this world. You are here for a special purpose and its accomplishment is for sure.

Self imaging is how do you see yourself? How would you like to be introduced? What tag are you carrying with your name?

When a mediocre commits him to a purpose, he starts looking himself as a champion and which always have resulted in a great success.

In our common life also, this is commonly observed that people behave differently in different environment, for example behaviour of same the person changes in a general tea shop in comparison to a starred restaurant. People do behave differently when faced by different category of people. The change in behaviour is apparent even when there is a slightest change in clothes one wears. 

Your behaviour can also get you surprise by a 360 degree change in behaving to a person to whom you wishes to impress to a commonly taken person.

People do have illusion that this about the other people and circumstances, but the truth is always reverse. This is who you are. Your behaviour tells about you only.

If you want to change your resulted areas, start changing your self image.

How to develop your self Image:

  1. Do firm promises and keep them on any cost
  2. Develop a discipline, a routine and maintain it religiously
  3. Dress according to your self image
  4. Follow the general behavior codes on daily basis
  5. Share minimum fifteen minutes daily with self
  6. Be who you are in your own light only.
  7. By increasing your comfort zones always.
  8. Always pay respect to others
  9. Be always loving, grateful and helpful

There is only one don’t and it is, “don’t compare yourself and your result with any other person.”

The people, who are honest and true, do live a life of achievements, happiness and always winning, the winning together.

success


Success is important. Keep yourself telling and awareness about your successes on daily basis, is living a life of happiness and gratitude. Success inspires success. As we keep all our similar things at one place, so as the nature does it for us. We find success, enjoyment, enthusiasm etc. alike at the same place. You should decide what you require. You have to decide the way you shall be imaged.

The challenge is success. And even the challenge is higher, when success required on daily basis, on every moment. Is it possible?

Yes. This is possible.

People have their own definition of success. Some have money, some have name, fame etc. In all my journey of life, meeting different people, I have asked a question time and again. The question is, “what is success?” What would you count as success?”

And one answer is common, “accomplishment of thought”. Yes, the answer in common is accomplishment of thought is success. Every single thought came to your mind and if it happens to real, it is success.

Success might have many faces but for any individual the conversion of thoughts is success. For a child allowance of a T.V. program, buying a sweet, wearing a particular dress or going or not going to school is a success.

A working person finds a success in appraisals, promotions, recognitions etc. and for an unemployed even getting a job is a success.

A home maker feels the success in a beautiful home and kitchen, developing her children and keeping herself update with the society and world.

When success is so simple and easy to achieve, than the question arises why most of the people don’t find this success in whole of their life? Why do we find more failures and fewer successes?

The simple answer is “they don’t know what they want?” We have understood simply that the success is achieving what we think. The failure lies at thinking level. The success is lacking for not having a particular goal or list of goals.

The people who have a routine in their life felt more accomplished and successful in life. One day I met a person in the early morning. He was very happy and cheerful. I asked his success mantra of being happy and cheerful, he simply replied that he follows a routine and keeping his routine makes him happy and cheerful.

He felt accomplished when he awakes on time daily, have a morning walk and a handy interaction with some people, visiting temple and than move on to his business. His routine about his health, food, working hours and society is the mantra of his happiness and cheerfulness. He explored by adding, “He is always there where he is”.  This means he always live in now and accomplishes more in now only. He stays focus on the work in hand and keeps the other things for their time to come.

Success is simple in achieving what you think and achieving it by developing and keeping simple routines.

This success on daily basis is winning, winning together.

Thursday, October 6, 2011

ह्रदय - भाव

यह भाव है मेरे जीवन की ताक़त, यह मेरे जीवन का विश्वास भी
कहीं कहीं मेरे जीवन का साथ हैं यह,  मेरे दोस्त भी हैं और मेरी आस भी

यह ही हैं कहीं मेरी परिभाषा, कहीं पर मन का उद्गार भी
यह हैं धरोहर मेरे जीवन की, मेरे जीवन का सार भी

खो गए कुछ बीच में साथी, कुछ ले अपने साथ सभी 
यही हैं स्वरुप, अनजान निर्रूप, जो मेरे हर दम साथ अभी

"ह्रदय" समर्पण श्रद्धा संग मेरे अपने हैं यह भाव सभी
कहीं दर्द कहीं सकुन है देते, मुझ पर इनके प्रभाव सभी 

Wednesday, October 5, 2011

आभार

आभार तुम्हारा मात सरस्वती 
मुझे गुरु का मान दिया है
वाणी ज्ञान की भिक्षा दे कर
मुझे सेवा का वरदान दिया है

गुरु की महिमा गाई वेदों ने
बड़ा देवों से सम्मान दिया है
मानव जीवन बन पुष्प वह महके 
मुझे माली का काम दिया है

सुविचारों के अंकुर नित फूटें
तेरी महिमा का गुणगान किया है
व्यवहार करूं जो दर्पण हो सबका 
तुमने बल संस्कारों का मुझको दिया है

ज्ञान बने न अभिमान कभी यह 
श्री कृष्ण को सब में प्रणाम किया है
रूप, कर्म और जीवन शैली से 
सब मानव का सम्मान किया है

माँ गुरु बनाया तेरी कृपा ने
"ह्रदय" पल पल तुमको प्रणाम किया है
आचार करे जो दे मान गुरु को
झोली फ़ैला, तुमसे माँ मांग लिया है

 

फ़रिश्ते


मैं बहुत दिन घर से दूर रहा
फिर भी घर के पास रहा
मान प्रेम बहुत मिला सब से 
हर वास्तु का आराम मिला

जगते ही आँखें तुम सामान दिया 
सोने तक सबका आराम किया 
हर आवाज़ पर तुम दौड़े आये 
भाई सा मेरा सम्मान किया 

सब मानें है सुख में ईश्वर
सुख देने वाले को फ़रिश्ते कहें
"ह्रदय" आभार तुम्हारा मन से करें 
तुम दोनों का ही काम किया

इन्सान जो कहलायें सेवादार

लेने के लिए मान लोग लड़ते नहीं थकते 
कुछ बिरले ऐसे भी हैं, जो देने के लिए जीते हैं

कुछ छत्त पर पहुँचने को
रहते हैं सदा परेशान
कुछ बन कर के औरों की सीढ़ी
सदा छत्त पर रहा करते हैं

कुछ धरती के हो कर
धरती पर नहीं टिकते 
कुछ धरती के नीचे रह
धरती से होते हैं

कुछ पा कर के सब सुख 
खुश हो नहीं पाते 
कुछ सुख दे कर औरों को
हँसते हैं, गाते हैं

दे दे के औरों को
वोह कैसे हैं सबसे छोटे 
जब औरों से सब पाकर 
कुछ बड़े कहलाते हैं 

"ह्रदय" देने से धन और दौलत 
चुकता नहीं कर्जा इनका 
मान दे दे जो दिल से
वोह बराबर कहलाते हैं
 

अश्रु

अब तो कहते नहीं अश्रु भी दिल का हाल, मुझे समझाने लगे हैं 
थम जाते हैं निगाहों में बहने की जगह,
"ह्रदय" जीवन का अक्स नए मायनों में दिखने लगे है

घुट जाता जब श्वास, उनके थमने से गले में 
मेरे जीवन में नव जीवन को जगाने लगे है
लोग जी लेते हैं इक जीवन ख़ुशी के गामी के लम्हों में 
यह थमते आंसू कुछ पलों में "ह्रदय" कईं जीवन दिखने लगे हैं

वहीं ओढ़ी होती है मोती चादर बड़े रुत्बोँ की ज़िन्दगी ने
वहीं कालीन रुसवाइयों के बिछाने लगे हैं 
रूकती नहीं नदियाँ अपनेपन की जहाँ पर
"ह्रदय" वहीं तनहाइयों के सागर लहराने लगे हैं
बैठा हूँ खामोश बेहरकत, वोह नज़ारे दिखने लगे हैं 
वो मन की स्याही से जाने, अनजाने चेहरे बनाने लगे हैं
"ह्रदय" जीवन का अक्स नए मायनों में दिखने लगे हैं


मानव लौ जलाने को हूँ


तेरी कृपा के शब्दों से, श्रद्धा सुमन चढाने को हूँ
मन से तन से, इस जीवन से, मानव लौ जलाने को हूँ

सुप्त हो गया है वह, जो चेतन भी है, चिंतन भी है 
सोए हुए अंगारों से माँ, जीवन लौ जलाने को हूँ

शोरगुल यह बढ़ रहा माँ, खामोश राहें हो रही
पा रहा "ह्रदय" मंजिलें पर, मंजिलें ही खो रही

खो गया हूँ खुद में यूँ माँ, खुद ही से माँ अब खो गया
तेरी कृपा की रोशनी से, विचारों की लौ जलाने को हूँ  


Tuesday, October 4, 2011

सबसे बड़ा मंदिर

सबसे बड़ा मंदिर वही है
जहाँ लोग मिलजुल कर रहते हैं
जहाँ मिलजुल कर काम करते हैं

इसे साफ़ रखें !
स्वयं सुरक्षित रहे !!



My first appointment - a cold call

When I have qualified the exam of IRDA for insurance agent, I was not having any work to do. The form was a commitment to one of my elderly friend. I was new to the city. I rarely knows the people there. I was in my country but feeling somewhere abroad.

I was in a habit to attend my office first in the morning and last in the evening, earlier at my place. So I retained that routine there also. Not having a good money with me and no place to go, I used to invest my most of the time there only.

I had never missed a chance to do anything whichever came in my way there. I used to help the visitors, filling of forms for other, do some banking activities, attending the invitee of my senior. I am a bit frustrated some time, when I was not cared and supported by the same way from some of my seniors as they do for others. I have to do all for myself. But I was enjoy it most of the time.

I have done many things in past but nothing was working for me now. Nothing was there which can boost my confidence. I always have the faith in myself but execution of the things was missing. Something was stopping me inside. Some unknown fear.

One day in the morning I requested the father of my senior to help me for doing cold calls as I was new to the city. He had taken the responsibility happily. And two days later I was on the roads with him hand in hand.

We moved to a distant place about a km. that was a banking square and an estate officer. There lot many attorney's and their assistant were sitting. He was observing intelligently. We have chose one from there. He signaled me to move to him.

With pure humbleness, the permission was taken from him to sit there. He was typing some legal documents. He have not disturbed him. After finishing his work in another 10 minutes, he hosted us with respect. I was standing and my elderly senior was sitting there.

He introduced me as an entrant to a new career and industry. A person with energy and knowledge, representing a big brand. He re applied a request. A request for when we can see him again in his available time for another 30 minutes to assist him with our knowledge and experience.

He allowed us at 3 pm, but on Saturday. this way I won my first appointment. An appointment on a cold call.





Leadership

On the day of induction of newly promoted managers, the trainer asked, "Who is the finest leader you have seen in your life?" What leadership skilled you have learned from him?

All the participants raised their hands. Somebody was influences by his last supervisor, some by the learning and development person and many have shown the fascination and influence of the company's leadership. HR department was the role model of some in many. There were also the followers of public leaders, saints and some dare to share the name of some political leaders for influencing their life.

The reasons were vivid from the interview style, the reporting system, the way of sharing the knowledge and personal experience. Some had shown the fascination for the body language and dressing sense. Achieving targets was the reason of many role models. Many have shown their confidence in regular promotions of the leaders and some were followed for their connection in the management. The list was long including the number followers and large public voice with them.

Seen them raising their voice collectively, trainer was trying to find out the lost voice. The voice which he had seen very calm, a calm listener. The voice which was a silent spectator of all the happening since morning. His smile was saying something else. As it were a competition of hypocrisy and pseudo praising of somebody. Taking the attention of the class, he pointed him and asked, May I know your name please?

I am Raghav.

Don't you agree with all these people and their experience?

How could I not, Saurabh!  This is their experience. I am listening and learning.

Don't you carry the similar experience? What's about yours?

Saurabh, "respecting the leadership of all the learned people, and trusting the experience of wonderful co mates, I have some different. My leader is the person who has transformed my life. Given me a vision. She is a lady of respect, honour and pride. Eventually she haven't attended the high school in her life."

There was a big laugh all over. With surprise and a symbol of curiosity and trust, Saurabh asked, Is it so?

Yes, this is right. She always said that leadership is not in books, academics, positioning high, authority or knowing, it's in people and their deeds. Truly it can be understood by followers but not in counting but through their actions. She had two pet saying. "Between saying and doing many a shoes are worn out" is the first and second is "People may doubt what you say but they will believe what you do. "

She had never found any mistake or error in the acts of her people but in her actions and decisions. She had never monitored the activities of any other for the call of trust and confidence. She was a lady of conviction that where the monitoring is required the teaching is not complete. Take the people for their age and experience. The place from where you visualize the action of others is far above and ahead of their stage. Evaluate what you were doing when you were in their position or stage.

She is my mother.

She taught me that leadership is nothing but empathy, love, encouragement and trust. Leadership is building relations and realizing dreams.Leadership is winning, winning of people, winning over all the fears and doubts, winning without making anybody loose. This winning is winning together.



भूकंप

धरती क्रौंधी मंडल क्रौंधा
रोम रोम से जलधारे बहे
मौत ने यूँ तांडव नाचा
वज्रों के दिल दहल उठे

दहला न मन उन मानव का 
सौदागरों के दिल थे बड़े
रोटी कपडा दान का बेचा 
बहु बेटी के किये बाज़ारखड़े 

ममता बेचीं माँ को बेचा 
कई कोखों को शर्मसार किया 
रोटी, बोटी से महँगी बिकती 
रोटी ने मानुष पशु किया

उठ यौवन, उठ जतन करें कुछ 
जननी ने "ह्रदय" पुकारा है 
मन कर्म वचन से इंसां हो ले
धरती ने किया इशारा है


  

ह्रदय संचार

उफान है समुद्र में 
हवाएं शोर कर रही
आकाश में आंतक हुआ
धरा साड़ी डोल रही

फिर मंथन, मंथन है मन का
मंथन की हवा कुछ बोल रही
उठ होने को भोर, निकलेगा सूरज
पंछियों की चह चह कुछ बोल रही

मन में एक आशा, आशा में बसंत 
कलियाँ आँखें खोल रही
मेघों से टपकी, टपकी हैं बूंदें 
मिटटी की खुशबू कुछ बोल रही

"ह्रदय" तू संचार कर, संचार कर भाव का
भावों की ज्योति डोल रही
विश्वास खुद का, विश्वास खुद में 
विश्वास की डोरी छोड़ रही


 

बड़े व्यापारी

आओ दुखों का व्यापार करें 
भूकंप बाढ़ आह्वान करें
सरकार हमारी सांझी होगी
जलजलों प्रकोपों का ध्यान करें 

पांचों अंगुली घी मै होगीं 
सिर कढाई में होगा
ठेके बटेंगें रस्ते बनेंगें 
हर खज़ाना फिर अपना होगा

रोटी बोटी छत्त चादर 
सभी बिकाऊ होंगें 
टकसाल लगेगी धन बरसेगा
मानवता के व्यापारी होंगे
 
"ह्रदय" व्यापारी बहुत बड़े हैं 
व्यापारी की शान बड़ी
बिन कंटक रहे जीवन इनके 
बिन सांसों के जीवन की कड़ी

जन जन की आत्मा सो रही है

जन जन की आत्मा सो रही है
सो रहा चिंतन कहीं 
उठ मनु के पौरुष उठ तू
तुझे ढूढ़ रहा है वक़्त कहीं 

ज्ञान है अक्षर का केवल 
मर्म की पर लौ नहीं 
उद्यम नहीं आशा नहीं है
है रक्त में तेज़ी नहीं 

मन वचन कर्मों में अंतर 
अंतर की ही खोज नहीं
लौ भी है, उजियारा भी है
अंधेरों की है पर सूझ नहीं

पा के जीवन खो के सांसें 
प्यासे को इक बूंद नहीं
"ह्रदय" बढ़ा ले कदमों को जब
है मंजिल तेरी दूर नहीं





मुसाफिर

किराये की बस्ती है
खोती हुई हस्ती है
मिट्टी की मूर्त है
मिट्टी से ही सस्ती है

अनमोल मुसाफिर है
सौदायी हैं निगाहें उसकी
बाटे हैं कर्मों के ये
तौले हैं सांसे उसकी

एक नदिया की धरा है
बहना ही सहारा है
मंजिल है सागर उसकी,
मिल कर ही किनारा है

रस्ते है पर्वत के,
अमावस का अँधियारा है
"ह्रदय" पहचान मुसाफिर को
अंतर मै उजियारा है