Monday, October 3, 2011

अन्न

मिट्टी से उपजा ये अन्न
मिट्टी की खात्तिर ये अन्न
मिट्टी ही अन्न का निरादर करती
मिट्टी मिट्टी मै मिलाती है अन्न

प्राण संचार करता है अन्न
प्राण बन मिट्टी में रहता है अन्न
प्राण मिट्टी में जब तक रहते
प्राणोँ को भटकता अन्न

प्रकृति का उपहार है अन्न
प्रकृति का उपकार है अन्न
प्रकृति का जो मान न रखते
प्रकति ही सुखाती है फिर यह अन्न

"ह्रदय" जो वोह जाने है अन्न
मनुख जो है वोह माने है अन्न
मनुख बढाई मानवता की अन्न
मनुख कमी कर्मों की है अन्न

सागर के तट बैठा लकीरें लगा रहा हूँ

मेहमान जिंदगी के अरमान सजा रहा हूँ
सागर के तट बैठा लकीरें लगा रहा हूँ

इक पल का राजा हूँ, भिखारी मै सांसों का
इक पल मै भिक्षु हूँ, धनवान ज़िन्दगी का
इस अनमोल जिंदगी की कीमत लगा रहा हूँ
सागर के तट बैठा लकीरें लगा रहा हूँ

ले रहा हूँ सांसें अहंकार को संजोए
खो रहा हूँ पल, आस बरसों की संजोए
इक मृग-तृष्णा की खातिर, दांव जीवन लगा रहा हूँ
सागर के तट बैठा लकीरें लगा रहा हूँ

देखता हूँ जब जमीं, है सच जो आसमान का
है वृक्ष गगन-चुम्भी भी, पौधा इसी जमीं का
फिर भी आसमान पर, महल बना रहा हूँ
सागर के तट बैठा लकीरें लगा रहा हूँ

गम है इसी जीवन का, ख़ुशी ना साथ जाएगी
इक कला है मिट्टी की, मिट्टी में ही मिल जाएगी
"ह्रदय" मिट्टी में रंग भरने की कोशिश कर रहा हूँ
सागर के तट बैठा लकीरें लगा रहा हूँ